सचिन तेंदुलकर भी हुए ‘जुगाड़’ के दिवाने: लकड़ी की कार देख कह दी दिल जीतने वाली बात

मुंबई: भारत में ‘जुगाड़’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अभावों में भी राह निकालने की एक जिद है। इसी ‘देसी इंजीनियरिंग’ के एक अद्भुत नमूने ने आज पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, जब क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने ग्रामीण भारत की एक अनोखी प्रतिभा को दुनिया के सामने पेश किया।

11 मई 2026 को सचिन तेंदुलकर द्वारा साझा किया गया एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल रहा है। इस वीडियो में ग्रामीण बच्चों की एक टोली द्वारा कबाड़ और लकड़ी से बनाई गई एक कार्यात्मक (Functional) कार ने न केवल राहगीरों को, बल्कि ‘मास्टर ब्लास्टर’ को भी अपनी गाड़ी रोकने पर मजबूर कर दिया।


भारतीय गांव के बच्चों द्वारा लकड़ी के जुगाड़ से बनाई गई गाड़ी चलाने का मनोरम दृश्य सचिन तेंडुलकर द्वारा साझा किया हुआ
गाँव की प्रतिभा का कमाल: सीमित संसाधनों में देसी जुगाड़ से तैयार लकड़ी की अनोखी गाड़ी!

क्या है वायरल वीडियो में?

सचिन तेंदुलकर ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक वीडियो पोस्ट किया है, जिसमें वे एक ग्रामीण इलाके से गुजरते समय कुछ बच्चों के पास रुकते हैं। इन बच्चों ने लकड़ी के तख्तों, पुराने टायरों और कबाड़ के लोहे की रॉड्स का इस्तेमाल करके एक चलती-फिरती ‘कार’ तैयार की है।


“बस मौका मिलना चाहिए”: तेंदुलकर ने बच्चों के हुनर को सराहा

सचिन तेंदुलकर अक्सर भारत की जमीनी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए जाने जाते हैं। इस बार, उन्होंने एक गांव की सड़क पर कुछ बच्चों को लकड़ी के तख्तों, पुराने पहियों और लोहे की रॉड्स से बनी एक हस्तनिर्मित कार चलाते देखा।

सचिन ने इस पल को रिकॉर्ड किया और अपने आधिकारिक हैंडल पर साझा करते हुए लिखा:

​”यह उस तरह की प्रतिभा है जो सही परिस्थितियों का इंतजार नहीं करती… बस मौका मिलना चाहिए! (Bas mauka milna chahiye!)”

स्रोत: Sachin Tendulkar Official Instagram/X Handle

तेंदुलकर का यह संदेश सीधे तौर पर भारत की उस ‘किफायती नवाचार’ (Frugal Innovation) की संस्कृति को सलाम करता है, जिसे दुनिया ‘जुगाड़’ के नाम से जानती है।


क्या है इस ‘देसी कार’ की खासियत?

​​ग्रामीण बच्चों द्वारा तैयार की गई यह मशीनरी भारत की ‘चलता है’ वाली मानसिकता को ‘करके दिखाते हैं’ में बदलती नजर आती है। इस वाहन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सामग्री: पूरी तरह से पुनर्नवीनीकरण (Recycled) की गई लकड़ी, पुरानी साइकिल/स्कूटर के पहिये और लोहे का कबाड़।
  • मैकेनिज्म: बच्चों ने एक सरल स्टीयरिंग सिस्टम और मैनुअल पैडल या छोटे इंजन का उपयोग करके इसे चलने योग्य बनाया है।
  • डिजाइन: यह कार किसी आधुनिक एसयूवी की नकल नहीं, बल्कि न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम उपयोगिता का उदाहरण है।

सोशल मीडिया पर ‘जुगाड़’ का ट्रेंड और सांस्कृतिक प्रभाव

यह वीडियो ऐसे समय में वायरल हुआ है जब भारतीय इंटरनेट पर ‘जुगाड़’ से जुड़ी कई अन्य कहानियां भी चर्चा में हैं। हाल ही में एक स्कूली छात्रा द्वारा अपनी PTM में शामिल होने के लिए एक रैपिडो राइडर को ‘फर्जी भाई’ बनाने की कहानी ने भी लोगों को खूब हंसाया और हैरान किया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि सचिन जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्व जब ऐसी कहानियों को साझा करते हैं, तो इससे ग्रासरूट लेवल (जमीनी स्तर) के आविष्कारकों का मनोबल बढ़ता है। यह न केवल मनोरंजन है, बल्कि भारतीय युवाओं की ‘प्रॉब्लम सॉल्विंग’ क्षमता का भी प्रमाण है।


चुनौतियां: क्या यह ‘जुगाड़’ सड़कों पर सुरक्षित है?

जहां सोशल मीडिया इन बच्चों की तारीफों से भरा पड़ा है, वहीं तकनीकी और कानूनी पहलू थोड़ा अलग है। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और परिवहन अधिकारियों (RTO) का कहना है कि:

  • सुरक्षा मानक: ऐसे वाहन किसी भी आधिकारिक सुरक्षा परीक्षण (Crash Test) से नहीं गुजरते।
  • पंजीकरण: भारत के मोटर वाहन अधिनियम के तहत, कबाड़ से बने और बिना पंजीकरण वाले वाहनों को सार्वजनिक सड़कों पर चलाना प्रतिबंधित है।
  • प्रतिभा को दिशा: अधिकारियों का सुझाव है कि इन बच्चों की प्रतिभा को ‘इनोवेशन सेंटर्स’ और ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ के माध्यम से सही दिशा मिलनी चाहिए ताकि वे भविष्य के असली इंजीनियर बन सकें।

निष्कर्ष: प्रतिभा को प्रोत्साहन की आवश्यकता

सचिन तेंदुलकर के इस कदम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत के गांवों में इंजीनियरिंग का हुनर कूट-कूट कर भरा है। आवश्यकता है तो बस इन ‘जुगाड़ू’ वैज्ञानिकों को सही मार्गदर्शन और मंच प्रदान करने की, ताकि उनकी ये छोटी सी लकड़ी की कार भविष्य की किसी बड़ी ऑटोमोबाइल क्रांति का आधार बन सके।​


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